शाम ढल रही थी। रामू अपने पशुओं को खिला-पिलाकर, रोज़ की तरह चाय की दुकान पर आ बैठे। दुकान के सामने वाली खटिया पर, हमेशा की जगह, चौधरी जी बैठे थे — पैंसठ के आसपास के, धोती-कुर्ते में, हाथ में लाठी टिकाए। गाँव में कोई भी बूढ़ा-जवान किसान होगा जिसने अपनी बीमार गाय या ब्याने वाली भैंस को लेकर कभी न कभी चौधरी जी का दरवाज़ा न खटखटाया हो। चालीस साल से ज़्यादा का वक्त उन्होंने मवेशियों के बीच ही गुज़ारा था
पड़ोसी गाँव के किसान सोहन आज कुछ ज़्यादा ही परेशान लग रहे थे। "मेरी एक गाय के पूरे शरीर पर अजीब सी गांठें निकल आई हैं," उन्होंने अपनी चाय बिना पिए हिलाते हुए कहा। "बुखार से शुरू हुआ था। अब गर्दन और पीठ पर सख्त गांठें बन गई हैं।"
चाय की दुकान पर तुरंत तरह-तरह की बातें उड़ने लगीं। कोई कहता था यह मच्छरों से आती है, कोई कहता था छूने से फैलती है, कोई तो यह भी कह रहा था कि यह हवा में उड़कर एक गाँव से दूसरे गाँव पहुँच जाती है।
चौधरी जी, अब तक चुपचाप सुन रहे थे। उन्होंने अपनी लाठी सीधी की और धीरे से बोले, "इतनी घबराने की बात नहीं, बेटा। पर अफवाहों पर मत जाना। यह बीमारी है - लंपी त्वचा रोग, या एलएसडी। इसे समझ लो तो डर आधा हो जाता है।"
यह बीमारी है क्या?
चौधरी जी ने बताया कि यह एक वायरस से होती है जो गाय और भैंस दोनों को अपनी चपेट में लेता है। बीमार पशु को बुखार आता है, त्वचा पर सख्त गांठें निकलती हैं, गिल्टियाँ सूज जाती हैं। दूध घट जाता है, कई बार तो काफी तेज़ी से। कुछ पशु कमज़ोर हो जाते हैं और हफ्तों तक दुबले-पतले दिखते हैं। "मौत बहुत कम पशुओं की होती है," चौधरी जी ने समझाया, "पर जिसका घर दूध की कमाई पर चलता है, उसके लिए यह भी कोई राहत की बात नहीं। नुकसान फिर भी बड़ा हो सकता है।"
यह फैलती कैसे है?
"सबसे बड़ी वजह हैं कीड़े-मकोड़े," चौधरी जी ने आगे कहा। "मच्छर, मक्खी, चिचड़ी — पहले किसी बीमार पशु को काटते हैं, फिर थोड़ी देर बाद किसी स्वस्थ पशु को। एक ही काटने में बीमारी साथ ले जाते हैं। पशुओं का आपस में छूना ज़रूरी भी नहीं।"



इसके अलावा गंदे औज़ार, एक ही सुई का कई पशुओं पर इस्तेमाल, साझा चारा-पानी, और बीमार पशु का स्राव भी बीमारी फैला सकते हैं। मंडी या मेले में पशुओं का आना-जाना भी इसे वहाँ पहुँचा सकता है जहाँ पहले नहीं थी।
"इसीलिए पड़ोसी गाँव की खबर भी अपनी ही खबर है," चौधरी जी ने रामू की तरफ देखते हुए कहा। "यह बीमारी सीमा की दीवार पर रुकती नहीं। और इस मौसम में तो तेज़ी से फैलती दिख रही है।"
आज यह करें: आसपास पता करें कि क्या आपके गाँव या नज़दीकी गाँवों में एलएसडी देखी गई है। अगर हाँ, तो बाड़े तक पहुँचने का इंतज़ार न करें - आज से हर पशु पर, यहाँ तक कि बिल्कुल स्वस्थ दिखने वालों पर भी, बारीकी से नज़र रखना शुरू करें, और उनकी रोग-प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के लिए रोज़ मल्टीविटामिन सप्लीमेंट देना शुरू करें।
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